यह प्रश्न तब-तब उठता है जब शहरी और ग्रामीण विकास के अंतर पर चर्चा होती है। यह दो राष्ट्रों के युद्ध की कथा नहीं है, जैसा वाक्यांश से प्रतीत होता है। यह एक-दूसरे के पूरक दो धारणाओं की कथा है।
पीपीएन मानता है कि दोनों तभी जीवित रह सकते हैं जब वे एक-दूसरे का सहारा बनें। भारत के सहारे के बिना इंडिया ढह जाता है। इंडिया के सहारे के बिना भारत मुरझा जाता है।
आज की स्थिति
इंडिया एक शहरी इकाई है, अपार क्रय शक्ति वाला 30 करोड़ का मध्यम वर्ग, जो अधिकतर शहरों और बड़े कस्बों में है। भारत वह सत्तर प्रतिशत से अधिक जनसंख्या है जो गाँवों में रहती है और जिसकी आजीविका कृषि है।
इंडिया की लोकप्रिय छवि तीव्र औद्योगीकरण की राह पर चलते देश की है। सच यह है कि उसकी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। अच्छा मानसून हर उपभोक्ता वस्तु की माँग बढ़ा देता है। एक ही मानसून की विफलता महँगाई लाती है, और सूखे में किसानों की आत्महत्याएँ सुर्खियाँ बनती हैं।
प्रश्न
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण ने इसे और तीखा किया है। विकास किस कीमत पर? क्या इंडिया भारत पर अतिक्रमण कर रहा है, या अपनी समृद्धि उसके साथ बाँट रहा है?
यही हम आपसे जानना चाहते हैं।
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