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प्रस्तावना
जनता की शक्ति
भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की, उसे 79 वर्ष हो चुके हैं, और इस प्रकार उसने लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाई। वह स्वतंत्रता भारत की जनता को उपहार में नहीं मिली थी; वह एक ऐतिहासिक जन-आंदोलन से अर्जित की गई थी। लाखों साधारण भारतीय, किसान, श्रमिक, विद्यार्थी, महिलाएँ, व्यवसायी और अनगिनत गुमनाम नायक, महात्मा गांधी जैसे महान राष्ट्रीय नेताओं के नेतृत्व में एकत्र हुए और जनता की सामूहिक इच्छा को ऐसी अजेय शक्ति में बदल दिया जिसने अंततः ब्रिटिश राज का अंत कर दिया।
उस ऐतिहासिक संघर्ष ने एक मूलभूत सत्य सिद्ध किया: जब लोग अपनी सामूहिक शक्ति के प्रति सजग होकर किसी साझा उद्देश्य के लिए एक हो जाते हैं, तब कोई सत्ता उन्हें सदा के लिए दबाकर नहीं रख सकती।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने एक और असाधारण यात्रा आरंभ की, राष्ट्र और लोकतंत्र को आधार से खड़ा करने की यात्रा। 26 जनवरी 1950 को भारत की जनता ने स्वयं को एक संविधान दिया, जिसने एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव रखी और प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की गारंटी दी।
इन दशकों में भारतीय लोकतंत्र ने राजनीतिक उथल-पुथल, युद्ध, आर्थिक संकट, सामाजिक तनाव और भारी चुनौतियाँ झेली हैं। सरकारें बदलीं, राजनीतिक दल उठे और ढले, मतदाताओं की पीढ़ियाँ आईं और गईं। किंतु एक संस्था अटल रही, भारतीय मतदाता।
इस लोकतांत्रिक प्रयोग का विस्तार विस्मयकारी है। 1951-52 के पहले लोकसभा चुनाव में भारत में लगभग 17.3 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह संख्या बढ़कर लगभग 98 करोड़ हो गई। देश भर में 64 करोड़ से अधिक नागरिकों ने वास्तव में मतदान किया। चुनाव 10 लाख से अधिक मतदान केंद्रों के माध्यम से कराए गए, जिससे भारत का चुनावी आयोजन विश्व में जन-भागीदारी के सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक बन गया।
प्रत्येक मत जनशक्ति की अभिव्यक्ति है।
भारतीय नागरिक केवल सरकार नहीं चुनता; मतपेटी के माध्यम से वह सत्ता में बैठे लोगों को समय-समय पर स्मरण कराता है कि संप्रभुता अंततः जनता की है। राजनीतिक अधिकार शासितों की सहमति से उपजता है, और निर्वाचित प्रतिनिधि उस अधिकार के न्यासी हैं, उसके स्थायी स्वामी नहीं।
भारत की आर्थिक यात्रा भी उतनी ही उल्लेखनीय रही है। 1951 में देश ने अपनी पहली पंचवर्षीय योजना आरंभ की, जिसके समक्ष औपनिवेशिक शोषण और गरीबी से जर्जर अर्थव्यवस्था को पुनर्निर्मित करने का विशाल कार्य था। योजना-काल छह दशकों से अधिक चला और बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) पर पूर्ण हुआ। उसके पश्चात भारत नीति आयोग के नेतृत्व में एक नए नीतिगत ढाँचे की ओर बढ़ा, जो बदलते आर्थिक और विकासात्मक परिदृश्य को दर्शाता है।
1991 का आर्थिक संकट एक और निर्णायक क्षण सिद्ध हुआ। भुगतान संतुलन के गंभीर संकट का सामना करते हुए भारत ने व्यापक आर्थिक सुधार किए और अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धा, निवेश और वैश्विक एकीकरण के लिए खोलना आरंभ किया। तीन दशकों से अधिक बीत जाने पर यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है।
भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है और सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। उसका विस्तृत होता मध्यम वर्ग, बढ़ती आकांक्षाएँ, तकनीकी क्षमताएँ, उद्यमशील ऊर्जा और विशाल घरेलू बाज़ार ने देश के आर्थिक परिदृश्य को मूल रूप से बदल दिया है।
किंतु भारत की कथा को केवल सकल घरेलू उत्पाद, आर्थिक रैंकिंग, राजमार्गों, तकनीक या नागरिकों के हाथों में मोबाइल फ़ोनों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
भारत की असली कथा उसके लोगों की कथा है।
वे लोग जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।वे लोग जिन्होंने संविधान अंगीकार किया।वे लोग जो मतदान के लिए पंक्तियों में खड़े रहे।वे लोग जिन्होंने अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से जवाबदेही माँगी।वे लोग जिन्होंने अन्याय का विरोध किया।वे लोग जिन्होंने व्यवसाय खड़े किए, खेत जोते, कारखानों और कार्यालयों में काम किया, राष्ट्र की सेवा की और अगली पीढ़ी को पाला।
फिर भी, स्वतंत्र भारत की विशाल उपलब्धियों के बावजूद संविधान का वचन अभी अधूरा है। गरीबी, असमानता, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, भेदभाव, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण, तथा समाज के बड़े वर्गों को गरिमा और अवसर से वंचित रखना, ये सब आज भी राष्ट्र के समक्ष चुनौती हैं।
इससे एक मूलभूत प्रश्न उठता है: यदि जनता ही संप्रभु है, तो इतनी शक्ति कुछ ही हाथों में क्यों केंद्रित रहती है?
लोकतंत्र को पाँच वर्ष में एक बार मतदान करने तक सीमित नहीं किया जा सकता। मतदान जनशक्ति का आरंभ है, अंत नहीं। एक सचमुच जीवंत लोकतंत्र के लिए सूचित नागरिक, पारदर्शी संस्थाएँ, जवाबदेह प्रतिनिधि, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस, सुदृढ़ नागरिक समाज और सबसे बढ़कर ऐसे नागरिक चाहिए जो अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों, दोनों को समझते हों।
जनशक्ति संस्थाओं को ध्वस्त करने की शक्ति नहीं है; यह उन्हें सुदृढ़ करने की शक्ति है।यह एक समुदाय की दूसरे के विरुद्ध शक्ति नहीं है; यह संविधान के मूल्यों से जुड़े नागरिकों की सामूहिक शक्ति है।यह केवल सरकारें बदलने की शक्ति नहीं है; यह बेहतर शासन माँगने की शक्ति है।
और यह केवल चुनाव के समय प्रयोग नहीं होती। यह प्रतिदिन प्रयोग होती है, जब नागरिक सत्ता से प्रश्न करते हैं, अन्याय का प्रतिरोध करते हैं, भ्रष्टाचार उजागर करते हैं, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हैं, सार्वजनिक जीवन में भाग लेते हैं और आग्रह करते हैं कि जिन्हें शक्ति सौंपी गई है वे जनता के प्रति उत्तरदायी बने रहें।
स्वतंत्रता संग्राम ने भारत को राजनीतिक स्वाधीनता दी।संविधान ने नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए।लोकतंत्र ने उन्हें मताधिकार दिया।
अगला महान कार्य जनशक्ति की पूरी संभावना को जगाना है।
भारत का भविष्य अंततः केवल उन लोगों से तय नहीं होगा जो सत्ता के पदों पर बैठे हैं, बल्कि उन करोड़ों साधारण नागरिकों से तय होगा जो यह निर्णय करते हैं कि उस शक्ति का प्रयोग कैसे किया जाए।
स्वतंत्र भारत के इतिहास ने पहले ही दिखा दिया है कि जब साधारण लोग एक साथ आते हैं तो क्या हो सकता है। अब हमारे समक्ष चुनौती यह है कि उस सामूहिक सामर्थ्य को लोकतंत्र, जवाबदेही, समता, न्याय और मानवीय गरिमा के लिए एक स्थायी शक्ति में बदला जाए।
क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति शासक की नहीं होती। वह जनता की होती है।
जनशक्ति ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
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वास्तविकता
किंतु दुर्भाग्य से गरीब लगभग वहीं हैं जहाँ थे, सबसे नीचे, और यदि कुछ हुआ है तो वे और नीचे धकेले गए हैं। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार तीस वर्ष पूर्व विश्व के गरीबों का पाँचवाँ हिस्सा भारत में था, अब एक तिहाई है। अर्थात् तीन दशक पहले की तुलना में आज भारत में अधिक गरीब हैं। और उनकी संख्या देश भर में लगभग 40 करोड़ है।
गरीबी से गरीबी जन्म लेती है। यह एक दुष्चक्र है। इससे भूख उपजती है। 2012 में भारत वैश्विक भूख सूचकांक में 65वें स्थान पर था। देश में अनाज की कमी न होते हुए भी कुपोषित बच्चों का प्रतिशत यहाँ सर्वाधिक है। गरीबी ही गरीबों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सभी स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ है। इसके साथ बच्चों, विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा का अभाव और युवाओं के लिए रोज़गार के अवसरों की कमी जैसी अन्य बुराइयाँ भी जुड़ी हैं।
आज भारत विरोधाभासों का, तीखी असमानताओं का और सबसे बढ़कर चुनौतियों का देश है। अनेक चल रही गरीब-हितैषी सरकारी नीतियों और योजनाओं के बावजूद गरीब गरीब ही बने हुए हैं। वे सदैव खैरात और रियायती अनाज तथा ईंधन के याचक बने रहे हैं। तत्कालीन सरकार अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं, जैसे बजट घाटा कम करने और अनुत्पादक व्यय घटाने के दबाव में गरीबों की सब्सिडी घटाने का कदम उठा सकती है।
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पीपीएन की दृष्टि
ऐसी स्थिति में लोगों को सशक्त बनाने की आवश्यकता है। उन्हें उनकी अपनी अंतर्निहित शक्ति का बोध कराना होगा। पीपल्स पावर ऑफ़ नेशन - राष्ट्रीय लोकशक्ति (पीपीएन), एक गैर-सरकारी संस्था और सहायक के रूप में, अपनी पहलों के माध्यम से लोगों के सशक्तिकरण में विश्वास रखता है। इनमें महिलाओं को विभिन्न उपलब्ध सरकारी और निजी योजनाओं तक पहुँचने का मार्गदर्शन देकर उनका सशक्तिकरण सम्मिलित है, विशेषकर बालिका शिक्षा और सामान्य रूप से वंचित एवं उपेक्षित बच्चों की शिक्षा।
पीपीएन का दृढ़ विश्वास है कि विद्यमान व्यवस्था से लड़ने के बजाय उसके साथ काम करना और उसका पूरा लाभ उठाना अधिक उचित है। इस लक्ष्य को पाने के लिए पीपीएन ऐसे समर्पित समाजसेवियों का एक दल तैयार करने का प्रस्ताव रखता है, जिन्हें बहुत छोटी आयु से इसी उद्देश्य के लिए तैयार किया जाए। शहरों और गाँवों, दोनों से आने वाले इन युवाओं के लिए देशभक्ति ही उनका एकमात्र पंथ, जाति और धर्म है। पीपीएन मानता है कि सच्ची देशभक्ति जनता, विशेषकर गरीबों की सेवा में निहित है। गरीबों के विषय में महात्मा गांधी का यह कथन स्मरणीय है।
उस सबसे गरीब और सबसे कमज़ोर व्यक्ति का चेहरा स्मरण करो जिसे तुमने देखा है, और स्वयं से पूछो कि तुम जो कदम उठाने जा रहे हो वह उसके किसी काम आएगा या नहीं।
पीपीएन जो भी पहल करेगा, उसके मूल में गरीबों और समाज की सेवा का भाव रहेगा, जो ऊपर कही गई देशभक्ति का सच्चा अर्थ है, और जिसका इन दिनों बहुत दुरुपयोग होता है। देशभक्ति युवाओं को धर्म और जाति की संकीर्ण सीमाओं से भी मुक्त करती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, "धर्म वह विचार है जो पशु को मनुष्य और मनुष्य को ईश्वर बनाता है।" किंतु आज हम देख रहे हैं कि धर्म मनुष्य को पशु बना रहा है, और ईश्वर इसका मूक साक्षी है।
पीपीएन को आशा है कि ये युवा हर परिवर्तन के वाहक बनेंगे और उस सामाजिक न्याय एवं समानता के अग्रदूत होंगे जिसकी हम खोज कर रहे हैं। वे गाँव गोद लेने की योजनाओं का मार्गदर्शन करने वाले विचारक होंगे, क्योंकि उनमें से कुछ स्वयं ग्रामीण हैं और गाँव की समस्याओं को जानते हैं: शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, बिजली और सबसे बढ़कर पेयजल तथा स्वच्छता का अभाव। पीपीएन इन युवाओं में राष्ट्र सेवा के साधन के रूप में देशभक्ति की विचारधारा रोपना चाहता है। यही बड़ा अंतर है, ऐसा अंतर जो राष्ट्र को बदल सकता है। निःस्वार्थ और समर्पित स्वयंसेवकों का, कल के स्वाभाविक और राष्ट्रीय नेताओं का ऐसा दल तैयार करना ही पीपीएन की दृष्टि और ध्येय है। यह कठिन और दीर्घकालीन लक्ष्य है। पीपीएन का विश्वास है कि यह प्राप्य है।

