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जन मंच
मंच पीपीएन वेबसाइट का "विचार-केंद्र" है। इसमें आगंतुकों को, विशेषकर युवाओं को, अपने विचार स्वतंत्र रूप से रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
मंच अपने पृष्ठ पर महान विचारकों के उद्धरण नियमित रूप से प्रस्तुत करता है।
मैं अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता। एकमात्र वास्तविक, गरिमापूर्ण और मानवीय सिद्धांत है सबका कल्याण।
चालू विषय
- सर्वोपरिमेरा भारतAs a thinking person, what is your idea of India, and how would you get there?0 उत्तर →
- इंडिया बनाम भारत: दो राष्ट्र नहीं, दो धारणाएँIs India encroaching upon Bharat, or sharing its wealth with it?0 उत्तर →
- धर्म बाँटता है, संस्कृति जोड़ती हैReligion belongs to some; culture belongs to all. Does that hold, in your experience?0 उत्तर →
मेरा भारत
"मेरा भारत" मंच के विषयों में से एक है। पीपीएन वेबसाइट के आगंतुक के रूप में आप अपना मत स्वतंत्र रूप से रख सकते हैं। एक विचारशील व्यक्ति के रूप में भारत की आपकी कल्पना, आपकी अवधारणा क्या है? आप अपने लक्ष्य तक कैसे पहुँचना चाहेंगे? अपने दृष्टि पत्र में निर्धारित लक्ष्यों को पाने के प्रयास में आप पीपीएन को क्या सलाह देंगे?
इंडिया बनाम भारत - दो राष्ट्र नहीं, दो धारणाएँ
इंडिया बनाम भारत का प्रश्न तब-तब उठता है जब देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास की विषमताओं पर चर्चा होती है। वास्तव में यह दो राष्ट्रों के युद्ध की कथा नहीं है, जैसा विषय से प्रतीत होता है। यह एक-दूसरे के पूरक दो धारणाओं की कथा है।
पीपीएन मानता है कि दोनों - इंडिया और भारत - तभी जीवित रह सकते हैं और फल-फूल सकते हैं जब वे एक-दूसरे का सहारा बनें। भारत के सहारे के बिना इंडिया ढह जाता है। इंडिया के सहारे के बिना भारत मुरझा जाता है। आज के संदर्भ में इंडिया एक शहरी इकाई है, जिसमें अपार क्रय शक्ति वाला 30 करोड़ का मध्यम वर्ग है, जो अधिकतर शहरों और बड़े कस्बों में रहता है। दूसरी ओर भारत में वह सत्तर प्रतिशत से अधिक जनसंख्या आती है जो गाँवों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और जिसकी आजीविका कृषि है।
आज इंडिया की लोकप्रिय छवि एक ऐसे देश की है जो उन्नत तकनीक से संचालित औद्योगीकरण की तीव्र राह पर है। सच यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। देश की एक अरब से अधिक जनसंख्या का लगभग सत्तर प्रतिशत आजीविका के लिए कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। अर्थव्यवस्था पर कृषि का प्रभाव तब स्पष्ट दिखाई देता है जब देश को अच्छा मानसून मिलता है। तब सर्राफ़ा सहित हर उपभोक्ता वस्तु की माँग बढ़ जाती है। किंतु एक ही मानसून की विफलता महँगाई और सफ़ेद वस्तुओं की बिक्री में भारी गिरावट ला सकती है। सूखे की स्थिति में किसानों की आत्महत्याएँ ही समाचारों की सुर्खियाँ बनती हैं।
प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनों मीडिया में देश की जो सामान्य छवि प्रस्तुत की जाती है वह यह है कि मॉल और बाज़ारों वाला इंडिया चमक रहा है, जबकि गाँवों का भारत कष्ट में है। कभी-कभार के सर्वेक्षण और अध्ययन बताते हैं कि भारतीय जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा प्रतिदिन 20 रुपये जितनी कम आय पर जीवित है। यह उन दावों के सामने विचित्र लगता है कि भारत 21वीं सदी में एक आर्थिक शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है।
इस समय विभिन्न राज्यों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों और गाँवों में भूमि अधिग्रहण ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि विकास किस कीमत पर? इसने इंडिया बनाम भारत का प्रश्न भी खोल दिया है। क्या इंडिया भारत पर अतिक्रमण कर रहा है? या इंडिया अपनी समृद्धि भारत के साथ बाँट रहा है? पीपीएन अपनी वेबसाइट पर बहस और चर्चा के माध्यम से इसका उत्तर जानना चाहता है।
धर्म बाँटता है - संस्कृति जोड़ती है
बहस का एक और विषय। मंच समय-समय पर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में समाज को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस और चर्चा आयोजित करने का प्रस्ताव रखता है।
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